गणेश शंकर विद्यार्थी - हिंदी पत्रकारिता के आदर्श पुरुष
26 अक्टूबर 1924 के "प्रताप" में प्रकाशित गणेश शंकर विद्यार्थी ने "धर्म की आड़" शीर्षक अग्रलेख में गांधी जी की धर्म-धारणा का समर्थन करते हुए लिखा था, " अजान देने, शंख बजाने, नाक दबाने और नमाज पढ़ने का नाम धर्म नहीं है। स्पष्ट है गणेश शंकर विद्यार्थी महात्मा गांधी के तरह धर्म के मानवतावादी पहलू के समर्थक थे और तमाम रूढ़ियों के खिलाफ
गणेश शंकर विद्यार्थी का जन्म 26 अक्टूबर 1890 में हुआ। स्कूली पढ़ाई खत्म होने के बाद आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करनी पड़ी। यहीं से उनका झुकाव पत्रकारिता की तरफ हुआ।
कानपूर नगर से प्रताप साप्ताहिक पत्र में 1913 से 1930 तक गणेश शंकर विद्यार्थी समानता और समता के विचारों को अभिव्यक्त कर रहे थे। चंपारण के किसानों पर निलहे गोरों के अत्याचार की कहानियाँ सबसे पहले गणेश शंकर विद्यार्थी ने ही प्रताप के माध्यम से जनता के सम्मुख रखी थी। बहुत वर्षों तक प्रताप महात्मा गांधी के विचारों का मुख्य पत्र के तरह रहा। इसका कारण गणेश शंकर विद्यार्थी का महात्मा गांधी के विचारों के प्रति झुकाव था। भारत में राजनीतिक बागडोर लेने से पहले महात्मा गांधी जब कानपुर पहुँचे, तब प्रताप कार्यलय में गणेश शंकर विद्यार्थी पहली बार महात्मा गांधी से मिले।
गणेश शंकर विद्यार्थी जहाँ एक तरफ गांधीवादी विचारों से प्रभावित थे तो वही दूसरी तरफ खुली राजनीति में क्रांतिकारी राजनीतक कार्यकर्ताओं का सहयोग भी करते थे। काकोरी मामले के कई अभियुक्त गणेश शंकर विद्यार्थी के शिष्य मंडली के युवक थे। चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, राजकुमार सिन्हा सभी गणेश शंकर विद्यार्थी के मित्र मंडली का हिस्सा थे। गणेश शंकर विद्यार्थी हिंसा के खिलाफ थे परन्तु क्रांतिकारियों की मदद करते रहते थे।
होमरूल आंदोलन, कुली प्रथा के विरुद्ध आंदोलन, निलहे गोरों के विरुद्ध आंदोलन, देशी नरेशों की स्वेच्छाचारिता के विरुद्ध आंदोलन प्रताप की विशेषताएँ थी। असहयोग आंदोलन के समय प्रताप के लेखों का में अलग ही वाणी सुनाई देती थी।
अपने लेखों में स्वतंत्र अभिव्यक्ति के कारण कई बार जेल जाना पड़ा। इन मामलों में पंडित मोतीलाल नेहरू, जवाहर लाल नेहरू, श्री कृष्ण मेहता जैसे राजनीतक गणेश शंकर विद्यार्थी के पक्ष में गवाही दिया करते थे।
25 मार्च 1931 के दिन कानपुर में हिंदू-मुस्लिम दंगों ने गणेश शंकर विद्यार्थी को शहीद बना दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी के मृत्यु पर महात्मा गांधी ने कहा था कि उनकी मृत्यु एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए हुई है कि ऐसी मृत्यु से उन्हें ईर्ष्य़ा होती है। ऐसी मौत तो बहुत ही फक्र की बात है और उन्हें भी ऐसी ही मौत मिले।
स्वयं अपने बारे में वर्णित शब्दों में गणेश शंकर विद्यार्थी कहते है कि-मैं दमन और अन्याय के खिलाफ एक सेनानी हूँ, चाहे वह नौकरशाहो, जमींदारों, पूंजीपतियों या उच्च जाति के लोगों द्वारा किया जाए। मैंने जीवन भर अत्याचार के खिलाफ, अमानवीयता के खिलाफ लड़ाई लड़ी है और ईश्वर मुझे आखिरी तक लड़ने की शक्ति दे।

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