सैयद हसन इमाम
सैयद हसन इमाम का जन्म 31 अगस्त, 1871 को पटना ज़िला के नेउरा गांव में हुआ। वालिद का नाम सैय्यद इमदाद इमाम था और बड़े भाई का नाम सर अली इमाम था। टीके घोष अकेडमी से शुरुआती पढ़ाई करने के बाद पटना कॉलेजिएट स्कूल में दाख़िला लिया।
अग्रेज़ी ज़ुबान पर बहुत अच्छी पकड़ के वजह से कॉलेज के डिबेटिंग सोसाइटी में हमेशा अव्वल रहते। वकालत की पढ़ाई के लिए इंगलैंड के मिडिल टेम्पल गए। सच्चिदानंद सिन्हा भी वकालत की पढ़ाई के इंग्लैंड आ चुके थे। दोनों न सिर्फ़ रूम पार्ट्नर बने; बल्कि साथ लंदन यूनिवर्सिटी कॉलेज में प्रफ़ेसर हेनरी से एक साल तक हिस्ट्री में लेक्चर भी अटेंड किया। लंदन के पैडिंटॉन पार्लियामेंट के डिबेट वो लगातार हिस्सा लिया करते थे; जहां उनकी क़दर एक लीडर के रूप में होती थी।
भारत में वकालत में हसन इमाम ने शोहरत के साथ बहुत पैसा कमाया। हसन इमाम से प्रेरित होकर टेकारी महराज ने अपनी अधिकतर दौलत महिलाओं की शिक्षा के लिए वक़्फ़ कर दिया; तब हसन इमाम को टेकारी बोर्ड के सम्मानित सदस्य बने; और लड़कियों की पढ़ाई के लिए कई स्कीम सुझाए। बिहार के पढ़े लिखे लोगों के साथ एक ‘द बिहारी’ नामक संस्था बनाई, हसन इमाम इसके अध्यक्ष बने।
1908 में कांग्रेस के अधिवेशन में हिस्सा लेने मद्रास गए,वहाँ से लौटने के बाद 1909 में बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी की स्थापना सोनपुर में की गई और इसके पहले अध्यक्ष हसन इमाम ही बने और इसी साल नवम्बर में बिहार स्टू़डेन्ट्स कांफ़्रेंस के चौथे सत्र की अध्यक्षता गया में की। दिसम्बर 1911 में कांग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ, हसन इमाम ने सिर्फ़ उसमें हिस्सा ही नहीं लिया, बल्कि अगला सेशन बिहार में करने की दावत भी दे दी। जो क़बूल भी हुआ, 1912 में कांग्रेस का अधिवेशन बांकीपुर में हुआ, जिसने पिछले किसी भी अधिवेशन की मुक़ाबले सबसे अधिक मुस्लिम शरीक हुए; इसका सेहरा भी हसन इमाम के सर है।
1916 में होमरूल आन्दोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। 1917 में बिहार प्रांतीय कांग्रेस के अध्यक्षता की और जब अप्रैल 1917 में गांधीजी बिहार आए, तब हसन इमाम ने उनका भरपूर सहयोग दिया।
कांग्रेस का एक विशेष सेशन 29 अगस्त से 1 सितम्बर 1918 तक बम्बई में हुआ, इसकी अध्यक्षता भी सैयद हसन इमाम ने ही की।
हसन इमाम ने सर्चलाइट नामक एक राष्ट्रवादी अंग्रेज़ी अख़बार निकालने में अहम रोल अदा किया; इस अख़बार के पहले सम्पादक सैयद हैदर हुस्सैन थे।
1920 में ख़िलाफ़त और सहयोग आंदोलन के समय आगे आगे रहे।1921 में ख़िलाफ़त आन्दोलन को नतीजे पर पहुंचाने के लिए भारतीयों का एक डेलीगेशन हसन इमाम की अध्यक्षता में इंगलैंड गया। सहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने की ख़ातिर हमेशा अंग्रेज़ी लिबास में रहने वाले हसन इमाम खादी का कपड़ा पहनने लगे थे। 1921 में बिहार उड़ीसा विधान परिषद के मेम्बर बने और इसके पहले निर्वाचित उपाध्यक्ष चुने गए।
1923 में लीग ऑफ़ नेशन की चौथी असेंबली में भारत की नुमाइंदगी करने जनेवा गए। 1927 में बिहार में साइमन कमीशन के बहिष्कार आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे थे। वहीं 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में सिर्फ़ ख़ुद ही हिस्सा नहीं लिया, बल्कि उनकी पत्नी और बेटी ने सक्रिय रूप से भाग लिया; जिन पर अंग्रेज़ों ने जुर्माना भी लगाया। वो स्वदेशी लीग के अध्यक्ष भी रहे।
19 अप्रैल 1933 को 62 साल की उम्र में बिहार के शाहाबाद ज़िला के जपला नामक गांव में हसन इमाम का इंतक़ाल हुआ।

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home